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​मनरेगा और जल निधि का महासंगम: : छत्तीसगढ़ के धमतरी में 'आजीविका डबरी' से बदल रही ग्रामीण इकॉनमी की तस्वीर

Vinod Prasad Sat, Jun 27, 2026

कलेक्टर ने बोथापारा और चनागांव का किया जमीनी निरीक्षण

​वैज्ञानिक मत्स्य पालन और बागवानी के इंटीग्रेटेड मॉडल से किसानों की आय होगी दोगुनी

​कॉर्पोरेट पार्टनरशिप (एबिस कंपनी) से इनपुट कॉस्ट में 25% की छूट, महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण पर विशेष फोकस

​रायपुर,26 जून 2026/ छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में आर्थिक स्वावलंबन और जल संरक्षण को लेकर एक बेहद अनूठा और सफल प्रयोग सामने आ रहा है। धमतरी जिले में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) और 'जल निधि परियोजना' के बेहतरीन तालमेल ने पारंपरिक खेती पर निर्भर रहने वाले ग्रामीणों के लिए अतिरिक्त आय के नए द्वार खोल दिए हैं। मनरेगा के तहत खोदे गए तालाबों (डबरी) को महज जल संचय तक सीमित न रखकर, उन्हें वैज्ञानिक मत्स्य पालन से जोड़ा गया है, जिससे ग्रामीण परिवारों की आजीविका में क्रांतिकारी बदलाव आ रहा है।
​इसी जमीनी हकीकत और इसकी भविष्य की संभावनाओं को परखने के लिए कलेक्टर ने नगरी विकासखंड के सुदूर ग्राम बोथापारा और चनागांव का सघन दौरा किया। उन्होंने सीधे खेतों की मेढ़ पर पहुंचकर महिला मत्स्य पालकों और प्रगतिशील किसानों से संवाद किया और इस आजीविका मॉडल को ग्रामीण समृद्धि की एक नई और स्थायी दिशा बताया।

​क्या है 'आजीविका डबरी' का पूरा बिजनेस मॉडल?

​अधिकारियों ने निरीक्षण के दौरान कलेक्टर को बताया कि प्रत्येक आजीविका डबरी का एक मानक आकार तय किया गया है। ग्रामीण इस मॉडल को अपनाकर बेहद कम लागत में अपनी आय दोगुनी कर रहे हैं। लगभग 33 हजार रुपये की लागत से वैज्ञानिक देखरेख में लगभग 6 महीने में 20*20*3 मीटर की आजीविका डबरी का निर्माण किया जा सकेगा।

लागत की तुलना में लगभग दोगुनी आय की शत-प्रतिशत संभावना

​कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) का सहारा

इस मॉडल को व्यावसायिक रूप से मजबूत बनाने के लिए प्रशासन ने 'एबिस कंपनी' के साथ हाथ मिलाया है। सामाजिक उत्तरदायित्व के तहत कंपनी इन ग्रामीण मत्स्य पालकों को मछली दाना (फीड) की खरीदी पर 25 प्रतिशत की विशेष छूट दे रही है। इससे किसानों की उत्पादन लागत काफी घट गई है और उनका शुद्ध लाभांश बढ़ गया है।

महिला सशक्तिकरण की मिसाल बनीं सावित्री दर्रो

​नगरी विकासखंड के ग्राम बोथापारा की महिला मत्स्य पालक श्रीमती सावित्री दर्रो के खेत पहुंचकर कलेक्टर ने खुद डबरी का मुआयना किया। सावित्री ने बताया कि उनके पास करीब 7 एकड़ कृषि भूमि है, जहां वे बरसों से पारंपरिक रूप से सिर्फ धान की खेती करती आ रही थीं। लेकिन अब उन्होंने अपने खेत में दो आजीविका डबरियां तैयार की हैं, जिनमें कतला, रोहू और मृगल प्रजाति की मछलियों का पालन हो रहा है।
​इस कहानी में नया मोड़ तब आया जब अधिकारियों ने बताया कि सावित्री के बेटे ओमप्रकाश को आधुनिक मत्स्य पालन तकनीकों की एडवांस ट्रेनिंग के लिए अगले महीने पुरी (ओडिशा) भेजा जा रहा है। वहां से ट्रेनिंग लेकर लौटने के बाद वह न सिर्फ अपने परिवार बल्कि पूरे इलाके के युवाओं को उन्नत और आधुनिक मत्स्य पालन की बारीकियां सिखाएगा।

नारायण सिंह का इंटीग्रेटेड फार्मिंग मॉडल

​इसके बाद कलेक्टर चनागांव के प्रगतिशील किसान  नारायण सिंह नेताम के खेत पहुंचे। नेताम ने अपनी 5 एकड़ कृषि भूमि में से दो आजीविका डबरियां विकसित की हैं। खास बात यह है कि वे डबरी के पानी से सिर्फ मछली पालन नहीं कर रहे, बल्कि उसके चारों तरफ आम की बागवानी (हॉर्टिकल्चर) भी अपना चुके हैं। डबरी के पोषक तत्वों से भरपूर पानी की वजह से बागवानी की फसल भी बंपर हो रही है, जिससे उन्हें सालभर एक फिक्स और मोटी आमदनी मिल रही है।कलेक्टर ने खुद मौके पर जाकर डबरी के पानी की गुणवत्ता (Water Quality) की जांच भी कराई।

16 से बढ़कर 50 गांवों तक पहुंचेगा यह सफर

​कलेक्टर ने जिले के अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए हैं कि मनरेगा के तहत बनने वाली हर एक सरकारी और निजी परिसंपत्ति का शत-प्रतिशत उत्पादक उपयोग होना चाहिए। उन्होंने कहा कि मनरेगा का उद्देश्य सिर्फ गड्ढे खुदवाना या अस्थाई रोजगार देना नहीं है, बल्कि ग्रामीण परिवारों के हाथ में एक ऐसा साधन सौंपना है जिससे वे जीवनभर कमाई कर सकें। मनरेगा, जल संरक्षण और वैज्ञानिक मत्स्य पालन का यह त्रिवेणी संगम महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाएगा, गांवों में कुपोषण दूर कर पोषण सुरक्षा लाएगा और छत्तीसगढ़ की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को दीर्घकालिक मजबूती देगा।
​वर्तमान में धमतरी जिले के 16 गांवों में यह आजीविका मॉडल सफलतापूर्वक जमीन पर उतर चुका है। इसकी अपार सफलता को देखते हुए जिला प्रशासन ने अब अगले चरण में 50 गांवों की 50 आजीविका डबरियों में इस मत्स्य पालन विस्तार का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है। ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक सशक्तिकरण और सतत कृषि विकास (Sustainable Agriculture) को गति देने की दिशा में यह प्रयोग एक नजीर बन चुका है।

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